25.4.18

माइक्रो पोस्ट - मनुष्य पुरुषार्थ का पुतला है और उसकी सामर्थ्य और शक्ति का अंत नहीं है ...

माइक्रो पोस्ट - मनुष्य पुरुषार्थ का पुतला है और उसकी सामर्थ्य और शक्ति का अंत नहीं है . वह बड़े से बड़े संकटों से लड़ सकता है और असंभव के बीच संभव की अभिनव किरणें उत्पन्न कर सकता है . शर्त यहीं है कि  वह अपने को समझे और अपनी सामर्थ्य को मूर्त रूप देने के लिए साहस को कार्यान्वित करें  .

24.4.18

मध्यप्रदेश सरकार पेंशनरों और सीनियर सिटिजन के प्रति संवेदनशील नहीं है


मध्यप्रदेश में गत 15 वर्षों से भाजपा की सरकार है और इस पार्टी को सरकार बनाने के लिए सीनियर सिटीजन और पेंशनरों के द्धारा भारी समर्थन दिया गया था जिसके कारण भाजपा मध्यप्रदेश में एकछत्र राज्य कर रही है ।  देश में निरंतर मंहगाई बढ़ रही है और इसे रोकने हेतु सरकार द्धारा कोई भी सार्थक पहल नहीं की गई है । केंद्र सरकार के द्धारा अपने कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए जनवरी 16 से 7 वें वेतनमान का लाभ प्रदान किया गया है और केंद्र सरकार के आदेशों का अनुसरण करते हुये देश के कई राज्यों के द्धारा अपने कर्मचारियों और पैंशनरों को  7 वें वेतनमान का लाभ प्रदान कर दिया गया है ।

केंद्र की घोषणा होने के बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री के द्धारा अनेकों बार घोषणाएँ की गई कि वे भी मध्यप्रदेश के कर्मचारियों और पेंशनरों को केंद्र सरकार द्धारा देय 2.57 प्रतिशत वृद्धि  के अनुसार जस का तस 7 वें वेतनमान का लाभ प्रदान करेंगें परन्तु दो वर्ष गुजर जाने के बाद भी प्रदेश शासन के द्धारा अभी तक आदेश जारी नहीं किये गए हैं ।

मध्यप्रदेश सरकार के द्धारा अपने नियमित कर्मचारियों के लिए 7 वें वेतनमान 2.57 प्रतिशत की वृद्धि का लाभ केंद्र सरकार के आदेशों के अनुरूप प्रदान कर दिया गया है और बजट में जनवरी 2016 के बाद रिटायर्ड होने वाले पेंशनरों को भी 7 वें वेतनमान का लाभ प्रदान करने की घोषणा कर दी है परन्तु यह पहला मौका है कि सरकार ने जनवरी 2016  के पूर्व सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों पेंशनरों के लिए 7 वे वेतनमान का लाभ प्रदान करने हेतु कोई भी आदेश प्रसारित नहीं किया गया है और जिससे पेंशनरों में लगातार आक्रोश बढ़ रहा है और सरकार इनके साथ दोहरी नीति अपना कर लगातार भेदभाव कर रही है जिससे अब पेंशनरों के धैर्य की सीमा टूट रही है और उन्हें मुखयमंत्री और वित्तमंत्री जी के थोथे वादों और घोषणाओं पर विश्वास नहीं हो रहा है ।

मध्यप्रदेश सरकार जहाँ एक ओर जनवरी 2016 के बाद रिटायर्ड होने वाले कर्मचारियों को 7 वे वेतनमान का लाभ प्रदान कर रही है तो दूसरी ओर जनवरी 2016 के पूर्व रिटायर्ड होने वाले कर्मचारियों को 7 वें वेतनमान का लाभ प्रदान नहीं कर रही है और इन्हें 7 वें वेतनमान का लाभ देने के लिये भेदभावपूर्ण रवैया अपना रही है और उन्हें 7 वें वेतनमान के लाभ से वंचित कर रही है । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह सरकार पेंशनरों को भी दो वर्गों में विभाजित करना चाह रही है और दोहरी नीति अपना कर पेंशनरों में भी भेदभाव कर रही है और पेंशनरों को आपस में भी बांटना चाह रही है जैसे - जनवरी 16 के पूर्व रिटायर्ड होने वाले एक वर्ग के पेंशनरों को 7 वें वेतनमान का लाभ प्रदान नहीं करना चाहती है तो दूसरी ओर जनवरी 2016 के बाद रिटायर्ड होने वाले दूसरे वर्ग के कर्मचारियों पेंशनरों को यह सरकार 7 वें वेतनमान का लाभ प्रदान कर रही है यह सरकार की भेदभावपूर्ण दोहरी नीति है ।

सरकार की इस दोहरी भेदभावपूर्ण नीति से मध्यप्रदेश के पेंशनरों में निरंतर आक्रोश बढ़ रहा है । पहले भी जितने वेतनमान बढ़ाये गए हैं उन सब में हमेशा कर्मचारियों और पेंशनरों को लाभ प्रदान करने हेतु एक साथ आदेश प्रसारित किए जाते थे परन्तु यह पहला मौका है कि नियमित कर्मचारियों के साथ पेंशनरों को भी 7 वें वेतनमान का लाभ प्रदान करने हेतु कोई भी आदेश प्रसारित नहीं किया गया है । मध्यप्रदेश सरकार के वित्त मंत्री ने बजट में पेंशनरों के लिये 10 प्रतिशत वृद्धि करने का प्रस्ताव किया है जिसमें 7 वें वेतनमान का लाभ देने हेतु कोई भी स्पष्ट बात नहीं की गई है और अगर प्रस्ताव के अनुसार 10 प्रतिशत की वृद्धि की जाती है उससे  पेंशनरों को प्रति माह दो से तीन हजार तक का नुकसान होगा । केंद्र सरकार के 7 वें वेतनमान के आदेश में कर्मचारियों और पेंशनरों को 2. 57 प्रतिशत वृद्धि का लाभ देने का आदेश है और इसमें 10 वृद्धि करने का कोई भी प्रावधान नहीं है ।

मध्यप्रदेश से अलग हुये राज्य छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र सरकार के आदेश के अनुरूप अपने कर्मचारियों और सभी पेंशनरों को 2. 57 प्रतिशत के हिसाब से 7 वें  वेतनमान का लाभ प्रदान करने के आदेश गत पांच माह पूर्व कर दिये हैं और स्वीकृति संबंधी अपना सहमति पत्र मध्यप्रदेश सरकार को पांच माह पूर्व प्रेषित कर दिया गया था जिसे मध्यप्रदेश सरकार गत पांच माह से दबाये रखें बैठी है और अभी तक मध्यप्रदेश के जनवरी 2016 के पूर्व रिटायर्ड पेंशनरों के लिये केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार के आदेशों के अनुरूप 2. 57 प्रतिशत के हिसाब से 7 वें वेतनमान का लाभ प्रदान करने हेतु कोई भी प्रस्ताव विधानसभा और केबिनेट में रखा नहीं गया है और ऐसा लग रहा है कि मध्यप्रदेश सरकार जनवरी 2016 के पूर्व रिटायर्ड हुए पेंशनरों को 7 वें वेतनमान का लाभ 2. 57 प्रतिशत के हिसाब से वृद्धि का लाभ देना नहीं चाहती है ।

अभी इन सेवानिवृत्तों पेंशनरों को छटवें वेतनमान के अनुसार 136 प्रतिशत डीए का भुगतान किया जा रहा है जबकि बर्तमान में डीए 139 प्रतिशत चल रहा है और खेद का विषय है कि एम.पी सरकार के द्धारा अभी तक उक्त तीन प्रतिशत डी.ए का भुगतान करने हेतु सात माह बाद भी कोई भी आदेश जारी नहीं किया गया है । देश में सीनियर सिटीजन और पेंशनरों को सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु पहल की जाती है तो मध्यप्रदेश पहला राज्य है जहाँ सीनियर सिटीजनों और पेंशनरों के साथ सरकार दोहरी नीति अपना कर  भेदभाव कर रही है जिससे इस सरकार के प्रति अब सीनियर सिटीजनों और पेंशनरों में भारी नाराजगी बढ़ रही है  और सरकार की कार्यप्रणाली और इन दोहरी नीतियों के कारण सरकार की छबि खराब हो रही है और एक जनता के बीच एक गलत संदेश जा रहा है ।

मध्यप्रदेश में अभी साढ़े तीन लाख पेंशनर्स है और उनके परिवारजनों सहित करीब पच्चीस लाख वोट होते हैं और बढ़ रही भीषण मंहगाई से वे भी परेशान हैं और वे भी चाहते हैं कि बढ़ रही भीषण मंहगाई में उन्हें भी राहत मिलें और सरकार उनकी ओर ध्यान दें । सरकार को चाहिये कि समय रहते इन पेंशनरों और सीनियर सिटीजनों की ओर जल्दी से जल्दी ध्यान दें और समानता के आधार पर इन्हें भी 2. 57 प्रतिशत की दर से 7 वें वेतनमान का लाभ जल्दी से जल्दी प्रदान करने हेतु आदेश प्रसारित करें अन्यथा आगामी चुनाव में पैंशनरों की नाराजगी चुनाव परिणामों में भारी हेर फेर करा सकती है और बर्तमान सरकार को इसका खासा खामियाजा भोगना पडेगा और हार का सामना करना पड़ेगा इसमें कोई संदेह नहीं है । ध्यान रखें कि कर्मचारियों और पेंशनरों की नाराजगी दिग्विजय की सरकार को भी ले डूबी थी ।

23.4.18

सच्चे संत/महात्मा वैभव का नहीं निर्मल भावनाओं का सम्मान करते हैं ...

एक गाँव में एक करोड़पति व्यापारी था उसे अपने धन पर काफी घमंड था और वह हमेशा गरीब लोगों का शोषण करता था और उन्हें खूब सताता था । एक बार व्यापारी के गांव में एक बड़े संत महात्मा आयें और वे एक गरीब की कुटिया में जाकर ठहर गये ।

जब व्यापारी ने सुना कि उसके गाँव में एक संत महात्मा आयें हैं तो वह उनके दर्शन करने गया और वहाँ जाकर उसने देखा कि महात्मा जी गरीब के घर में रूखी सूखी रोटी खा रहे हैं । यह देख व्यापारी ने महात्मा जी से कहा कि आप यहाँ रुखा सूखा भोजन कर रहे हैं मेरे गांव में जो भी संत महात्मा आते हैं वे मेरे ही घर में रुकते हैं और मेरे घर में किसी भी तरह की कमी नहीं हैं और आपसे निवेदन हैं कि आप मेरे यहाँ ठहरें और विश्राम करें ।

महात्मा जी ने कहा - यह भोजन अत्यंत रुचिकर है और मैं तो मेहनत की कमाई से कमाया गया अमृत खा रहा हूँ और जो आनंद इस रूखे सूखे भोजन करने में मुझे मिल रहा है वह स्वादिष्ट पकवानों में भी नहीं मिलेगा । महात्मा जी के वचनों को सुन कर व्यापारी को यह ज्ञान हो गया कि सच्चा संत महात्मा वे ही होते हैं जो वैभव का नहीं व्यक्ति की निर्मल भावनाओं का सम्मान करते हैं ।

19.4.18

करेंसी संकट के लिए सरकार और बैंकिंग प्रबंधन और कई कारण जिम्मेदार है


देश में जब नोटबंदी शुरू की गई तो लोगों ने चढ़ बढ़ कर नोटबंदी का स्वागत इस उम्मीद के साथ किया था कि देश में काला धन की समाप्ति हो जायेगी और लोग बाग काला धन इकठ्ठा नहीं कर पायेंगें । एक समय सीमा में सरकार ने बंद की गई करेंसी वापिस लेकर देश के नागरिकों को नये नोट जारी किये । देश के नागरिकों ने करेंसी के लिये काफी दिक्कतों का सामना किया फिर भी उन्होंने सरकार की इस नीति का स्वागत किया कि नोट बंदी की प्रक्रिया से हमारे देश का अर्थतंत्र मजबूत होगा ।

सरकार ने एक हजार और पांच सौ के नोट बंद कर दो हजार का नया नोट निकाला और कैशलेश/ डिजिटल लेनदेन के लिये नागरिकों को प्रोत्साहित किया और लोगों को समझाईस दी कि अधिकाधिक डिजिटल लेनदेन करें । सरकार और नेताओं के द्धारा बीच बीच में अपने भाषणों के दौरान यह भी बताया था कि कैशलेश/ डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिये सरकार कम मात्रा में करेंसी प्रिंट करा रही है । दो हजार के बड़े नोटों से लोगों को लेनदेन में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था इसीलिए सरकार ने फिर से दो सौ रुपये का नया नोट जारी किया ।

मुद्राबंदी के ठीक एक साल बाद लोगबाग फिर से करेंसी के लिए भटक रहे हैं उन्हें खर्च के उनकी मेहनत से जमा पूँजी भी नहीं मिल पा रही है । देश के हजारों एटीएम खाली पड़े हैं और लाखों लोग कैश के लिये यहाँ वहां भटक रहे हैं और पूरे देश में फिर से नोट हदबंदी जैसी स्थिति निर्मित हो गई है । लोगों के यहाँ शादी विवाह हैं तो किसी के यहाँ कुछ कार्यक्रम हैं तो किसी को खरीददारी करने के लिए रुपयों की सख्त जरुरत है । लोगबाग कर्ज लेकर अपने खर्चे की पूर्ती कर रहे हैं । एक तरफ सरकार कह रही है कि देश में नोटों की कोई कमी नहीं है फिर भी लोगबाग रुपयों के लिए क्यों भटक रहे हैं  । देश में कम मात्रा में करेंसी प्रिंट करवाने के कारण अचानक करेंसी की कमी पड़  गई है अब फिर से प्रिंट कराने की नौबत आ गई है ।

एक बैंक के अधिकारी ने बताया कि ऊपर से आदेश हैं कि डिजिटल लेन देन को बढ़ावा देने के लिए 80 प्रतिशत एटीएम को खाली रखा जाए और लोग बागों को नगद कैश न देकर डिजिटल लेन देन करने को कहा जाये । नोटबंदी  के बाद केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के द्धारा डिजिटल ट्रांजेक्शन को सख्ती से बार बार लागू करने के लिए कहा गया और उन्होंने कैशलेश/ डिजिटल लेनदेन को लागू करने के लिए पुरजोर वकालत की और विदेशों के कई उदहारण दिये कि इंग्लैंड में 80 प्रतिशत अमेरिका में 67 प्रतिशत तो स्वीडन में 90 प्रतिशत डिजिटल लेनदेन किया जाता है इसीलिए इसे भारत में लागू किया जाए क्योंकि लोगों के पास स्मार्ट एंड्रॉएड फोन हैं पर ये भूल गए कि विदेशों में यह व्यवस्था तीस चालीस पहले से की जा रही है और वहां नेट संचार व्यवस्था बढ़िया है और वहां किसी प्रकार के सायवर क्राइम और किसी तरह के फ्राड नहीं होते हैं ।

भारत में यह व्यवस्था जोर जबरजस्ती डंडे के साथ लागू करना उचित नहीं हैं । भारत देश में करीब चालीस प्रतिशत गरीब जन निवास करते हैं अशिक्षित हैं और ठीक तरह से मोबाईल का इस्तेमाल करना भी नहीं जानते हैं और तो और देश के कई क्षेत्रों में फोन लगाने पर नेटवर्क नहीं मिलता है । पढ़े लिखे लोग भी सायवर क्राइम होने के डर से डिजिटल लेनदेन करने में डरते हैं । देश में अनेकों घटनाएं हो चुकी हैं । देश में कई जगहों में नेट सर्वर नहीं मिलता है इस स्थिति में डिजिटल ट्रांजेक्शन करने की व्यवस्था सुचारु ढंग से काम नहीं करती है तो लोगबाग असहाय की स्थिति में आ जाते हैं कि अगले को कैसे भुगतान करें । घर के खर्चे चलाने के लिए लोगों को नगद रुपयों की जरुरत पड़ती है दूध वाले को किराना वाले को धोबी को सब्जी वाले को और सभी जगह आवश्यक वास्तु खरीदने के लिए नगद रुपयों की जरुरत पड़ती है ।

देश में सभी व्यापारियों के पास स्वाइप मशीन नहीं हैं । दो हजार से अधिक की खरीद करने पर स्वाइप मशीन में स्वैप करने पर या क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने पर लोगों को अतिरिक्त भुगतान टेक्स के रूप में करना पड़ता है इसीलिए अधिकांश लोगबाग़  इस व्यवस्था से परहेज करते हैं और लोग बाग़ नगद भुगतान करना पसंद करते हैं कि इससे उनका टेक्स बचेगा । सरकार को डिजिटल लेन देन को यदि बढ़ावा देना है तो  टेक्स लगाना बंद कर देना चाहिये ।

इस समय मध्यप्रदेश में करेंसी की कमी का एक कारण यह भी हजारों करोड़ों रुपयों भावान्तर जैसी योजनाएं में भुगतान किये जा रहे हैं जिससे बैंकों में करेंसी की कमी बन गई हैं । नोटबंदी  के बाद दो हजार और दो सौ के जो नए नोट निकाले गए थे उनके लिए बैंकों के द्धारा अपने अपने एटीएम के सॉफ्टवेयर फार्मेट नहीं कराये गये । कई एटीएम में दो सौ के नोट कभी निकले ही नहीं हैं । धीरे धीरे बाजार से अन्य जगहों से दो सौ और दो हजार के नोट गायब हो गए हैं जिससे देश के करोड़ों लोगों को खर्च चलाने के लिए करेंसी के लिए अब भटकना पड़  रहा है इससे अब लोगों के मन में अब गलत संदेश  जा रहा है कि खर्चा चलाने के लिए उनकी बैंकों में जमापूंजी उन्हें मिलेगी कि नहीं संदेह भ्रम की स्थिति बन रही है और लोगों का सरकार और बैंकों के प्रबंधन से विश्वास  उठने लगा है ।  लोगों के मन में सरकार के प्रति गलत संदेश जा रहा है ।

सरकार को चाहिए कि जल्द से जल्द नए नोट जारी करें और डिजिटल लेन देन को सख्ती से लागू न करें इसमें नियमों में कुछ लचीलापन लाये । देश में डिजिटल लेन देन की व्यवस्था सुचारु रूप से चलने में अभी करीब दस पंद्रह साल का समय और लगेगा तब तक सरकार देश के लोगों को जागरूक करें अभी इस समस्या का तात्कालिक निराकारण करने हेतु देश के लोगों को नगद नारायण जल्द से जल्द उपलब्ध करायें अगर इसी तरह की स्थिति बनी  रही तो आगे सरकार को काफी संकट का सामना करना पडेगा और आगामी चुनावों में इसका असर देखने मिलेगा ।

जय हो नगद नारायण